बूझो तो जानें!
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मेरे पास पत्ते हैं, लेकिन मैं पेड़ नहीं हूँ। मेरे पास पन्ने हैं, लेकिन मैं किताब नहीं हूँ। मेरे अंदर ज्ञान है — मैं क्या हूँ?
अखबार में पत्ते (pages/leaves) होते हैं, ज्ञान और खबरें होती हैं — लेकिन यह किताब नहीं और पेड़ नहीं है!
मैं हर रोज़ आता हूँ, पर कभी रुकता नहीं। मुझे कोई देख नहीं सकता, पर सब मुझे महसूस करते हैं। मेरा नाम क्या है?
समय हर रोज़ आता है, बिना रुके चलता रहता है। हम समय को देख नहीं सकते लेकिन सबको महसूस होता है।
मेरे पास चार पाँव हैं सुबह, दोपहर में दो, और शाम को तीन। मैं कौन हूँ?
बचपन में बच्चा चारों हाथ-पाँव से चलता है (४ पाँव)। बड़े होने पर दो पाँव से चलता है। बुढ़ापे में छड़ी लेकर चलता है — इसलिए तीन!
मैं जितना खाता हूँ उतना बड़ा होता जाता हूँ। जब पानी पिऊँ तो मर जाता हूँ। मैं क्या हूँ?
आग जितना ईंधन (खाना) मिले, उतनी बड़ी होती है। लेकिन पानी डालने से बुझ जाती है — यानी 'मर' जाती है!
मेरे बिना घर अधूरा है, पर मैं घर के बाहर रहता हूँ। सबको अंदर जाने देता हूँ — पर खुद कभी अंदर नहीं जाता। मैं क्या हूँ?
दरवाज़ा घर का हिस्सा है, वह सबको अंदर जाने देता है, लेकिन खुद दरवाज़ा हमेशा बाहर ही रहता है!
मेरी एक आँख है लेकिन मैं देख नहीं सकता। मैं धागा ले जाता हूँ पर कपड़ा नहीं पहनता। मैं क्या हूँ?
सुई में एक छेद (आँख) होता है जिससे धागा पिरोया जाता है। सुई देख नहीं सकती और वह खुद कपड़ा नहीं पहनती!
मैं वो चीज़ हूँ जिसे तुम दे सकते हो लेकिन खुद रख भी सकते हो। जितना दो उतनी बढ़ती है। मैं क्या हूँ?
खुशी ऐसी चीज़ है जिसे बाँटने पर बढ़ती है। दूसरों को खुश करने से खुद की खुशी भी बढ़ती है!
मेरे पास पंख हैं लेकिन मैं उड़ नहीं सकता। मेरे पास एक मुँह है लेकिन बोल नहीं सकता। हर रोज़ तुम मुझे भरते हो। मैं क्या हूँ?
बस्ते (स्कूल बैग) के 'पंख' जैसे कंधे की पट्टियाँ होती हैं, एक मुख (ज़िप या खुलने की जगह) होती है, और रोज़ किताबें भरते हैं!
मैं हर जगह हूँ लेकिन दिखता नहीं। मेरे बिना तुम जी नहीं सकते। मैं क्या हूँ?
हवा हर जगह है — लेकिन दिखती नहीं। बिना हवा (ऑक्सीजन) के हम साँस नहीं ले सकते और जी नहीं सकते!
जितना ज़्यादा लो, उतना ज़्यादा छोड़ते जाते हो। मैं क्या हूँ?
जितना ज़्यादा चलते हो, उतने ज़्यादा क़दम (पैरों के निशान) पीछे छोड़ते जाते हो!